खोया हुआ विश्वास
वह दिसंबर की एक ठंडी सुबह थी। हल्की धुंध चारों ओर फैली हुई थी, और सूरज बादलों के पीछे छिपा हुआ था। ऐसा लगता था जैसे प्रकृति भी उदास थी। शीतल हवा के झोंके चेहरे को चुभ रहे थे, लेकिन अंशु ने इन सबसे बेपरवाह अपनी रफ्तार तेज कर ली। वह जल्दी से रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ रहा था। उसके हाथों
में एक छोटा सा बैग था, और उसकी आँखों में अजीब सा तनाव झलक रहा था।
अंशु के जीवन में कुछ भी वैसा नहीं था जैसा वह चाहता था। उसके सपने, उसकी इच्छाएं, सबकुछ धीरे-धीरे किसी अनजान अंधेरे में खो गया था। उसके माता-पिता का देहांत तब हो गया था, जब वह मात्र दस साल का था। उसे उसकी दादी ने पाला था, लेकिन उनकी भी कुछ साल पहले मृत्यु हो गई। अब अंशु बिल्कुल अकेला था।
वह हमेशा से कलाकार बनना चाहता था। चित्रकारी उसका जुनून था। जब वह रंगों के साथ खेलता, तो ऐसा लगता मानो उसका जीवन कुछ देर के लिए संवर गया हो। लेकिन यह दुनिया हमेशा सपनों के पीछे दौड़ने वालों के लिए आसान नहीं होती।
पैसे की कमी और अपनों का सहारा न होने के कारण उसने अपने सपनों को मार दिया।
स्टेशन पहुंचते ही उसने देखा कि ट्रेन आ चुकी थी। वह जल्दबाजी में ट्रेन में चढ़ गया और अपनी सीट पर जाकर बैठ गया। ट्रेन धीरे-धीरे चलने लगी। वह खिड़की से बाहर देख रहा था, जहां ठंड के कारण लोग आग जलाकर अपने आप को गर्म रखने की कोशिश कर रहे थे। उनके चेहरों पर परेशानियां साफ झलक रही थीं। यह दृश्य अंशु के मन में गहरी छाप छोड़ गया।
ट्रेन में सफर करते हुए उसकी मुलाकात एक वृद्ध व्यक्ति से हुई। उस व्यक्ति ने मुस्कुराते हुए अंशु से पूछा, "बेटा, कहां जा रहे हो?" अंशु ने धीरे से जवाब दिया, "शहर में काम की तलाश में।" वह आदमी थोड़ा ठहर कर बोला, "क्या करते हो?" अंशु ने झिझकते हुए कहा, "मुझे चित्रकारी पसंद है, लेकिन पेट भरने के लिए कोई भी काम कर लूंगा।"
उस आदमी ने अपनी आंखों में गहरी गंभीरता के साथ कहा, "बेटा, दुनिया में हर इंसान को अपने सपनों के लिए लड़ना चाहिए। सपने ही हमें जीने की वजह देते हैं।" यह सुनकर अंशु चुप हो गया, लेकिन उस वृद्ध व्यक्ति की बातें उसके दिल में गूंजने लगीं।
शहर पहुंचने के बाद, अंशु ने छोटे-मोटे काम शुरू कर दिए। कभी किसी दुकान में सामान बेचता, तो कभी किसी के घर में सफाई करता। वह दिनभर मेहनत करता और रात को थक कर सो जाता।
लेकिन उसके दिल में वह बात बार-बार आती कि क्या वह अपनी जिंदगी यूं ही बर्बाद कर देगा? क्या उसकी प्रतिभा कभी सामने आ पाएगी?
एक दिन, उसकी मुलाकात एक महिला से हुई। वह महिला एक आर्ट गैलरी की मालिक थी। उसने अंशु के हाथ में कुछ पुराने कागज देखे, जिन पर उसने अपनी चित्रकारी की थी।
महिला ने कहा, "तुम्हारे हाथ में जादू है। क्या तुम मेरी गैलरी में काम करना चाहोगे?" अंशु ने अविश्वास से उसकी ओर देखा और कहा, "लेकिन मुझे नहीं लगता कि मेरी कला किसी को पसंद आएगी।"
महिला ने मुस्कुराते हुए कहा, "हर कलाकार की कला की सराहना करने वाला कोई न कोई जरूर होता है। बस उसे खुद पर भरोसा रखना चाहिए।" उस दिन से अंशु ने अपनी कला को एक नई दिशा देना शुरू किया। वह दिन-रात मेहनत करता और अपनी कला को निखारता। धीरे-धीरे उसकी कला को लोग पहचानने लगे।
एक दिन, उसी गैलरी में उसकी प्रदर्शनी लगी। वहां बहुत सारे लोग आए। हर कोई उसकी कला की तारीफ कर रहा था। अंशु को अपनी मेहनत का फल मिल रहा था।
लेकिन उसकी नजरें भीड़ में उस वृद्ध व्यक्ति को खोज रही थीं, जिससे उसकी ट्रेन में मुलाकात हुई थी। उसे लगता था कि वही व्यक्ति उसकी प्रेरणा का असली कारण है।
वह धीरे-धीरे सफलता की सीढ़ियां चढ़ने लगा। लेकिन उसने कभी अपने पुराने दिनों को नहीं भुलाया। उसने फैसला किया कि वह उन बच्चों की मदद करेगा, जो आर्थिक तंगी के कारण अपने सपनों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। उसने एक आर्ट स्कूल खोला, जहां वह गरीब बच्चों को मुफ्त में कला सिखाने लगा।
अंशु का जीवन अब पूरी तरह बदल चुका था। लेकिन वह अक्सर सोचता था कि अगर वह उस वृद्ध व्यक्ति से ट्रेन में नहीं मिलता, तो शायद आज भी वह छोटे-मोटे काम कर रहा होता। उसे एहसास हुआ कि जीवन में सही समय पर मिली प्रेरणा किसी का जीवन बदल सकती है।
एक दिन, जब वह अपने स्कूल में बच्चों को सिखा रहा था, तो एक छोटा सा बच्चा उसके पास आया और बोला, "सर, मैं बड़ा होकर आपके जैसा बनना चाहता हूँ।" अंशु ने उस बच्चे को प्यार से देखा और कहा, "सपनों का पीछा करना कभी मत छोड़ना। दुनिया तुम्हारे रास्ते में रुकावटें जरूर डालेगी, लेकिन तुम्हारा जुनून ही तुम्हें जीत दिलाएगा।"
इस तरह, अंशु की कहानी सिर्फ उसकी नहीं रही, बल्कि हर उस इंसान की प्रेरणा बन गई, जिसने कभी अपने सपनों को दबाने की कोशिश की थी।

0 टिप्पणियाँ
if u have any doubts .Please let me know